जो बैंक कर्ज देकर लोगों को घर-मकान दिलाने का दम भरते हैं, अगर वही हद दर्जे की अमानवीयता पर उतर आएं तो क्या कहा जाएगा। यह सवाल इधर इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि मुंबई के एक पॉश इलाके में स्थित एक निजी बैंक के दफ्तर के बाहर फर्श पर मोटी कीलें लगा दी गईं, ताकि इलाके के बेघर रात में वहां सो न सकें और लोग वहां बैठकर आराम न फरमा सकें। सोशल मीडिया पर इसकी काफी आलोचना हुई। इसके बाद बैंक ने अपनी गलती मानते हुए कीलों को हटवा दिया। आखिर हमारे देश-समाज में बेघरों को लेकर एजेंडा क्या है ।बेघरों की दुर्दशा देखनी हो तो शहरों पर नजर डालनी होगी। गांव-कस्बे से उखड़कर रोजी-रोजगार के लिए या फिर इलाज के लिए शहर के अस्तपालों में स्थायी या अस्थायी तौर पर डेरा डालने वालों के लिए शहर तो जैसे सितम ही साबित होते हैं। यूं शहरों में उनका थोड़ा-बहुत सहारा होते हैं वे रैन बसेरे जिन्हें सरकारें ऐसे ही गरीब-मजलूमों के लिए बनाती और चलाती है। पर ज्यादातर रैन बसेरे किन हालात में हैं, उनमें कैसी सहूलियतें मिलती हैं, इसका अंदाजा समय-समय पर की जाने वाली अदालती टिप्पणियों से मिल जाता है।कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया था कि वे बेघरों के लिए रैन बसेरों की समुचित व्यवस्था करें, जिससे ठंड से एक भी व्यक्ति की मौत न हो। अदालत इससे चिंतित थी कि ज्यादातर राज्यों ने बेघर लोगों को आसरा मुहैया कराने की दिशा में कुछ खास काम नहीं किया है। आज से दस साल पहले 2008 में हुए एक अध्ययन से पता चला था कि दिल्ली में करीब डेढ़ लाख लोगों को ठंड में बाहर रात गुजारनी पड़ती है। इस एक दशक के अंतराल में यह आंकड़ा ज्यादा तो नहीं बढ़ा लेकिन सर्दी में बेघरों की मौतों में इजाफा जरूर हुआ है। दिल्ली में बेघरों की दुर्दशा का एक मामला इसी साल यहां की विधानसभा में भी उठा। बताया गया है कि रैन बसेरों में बढ़ती जा रही लापरवाही के कारण बेघरों की मौत के आंकड़े बढ़ रहे हैं।आंकड़ों को देखें तो 2017 दिल्ली में 402 बेघर लोगों की मौत हुई, जबकि वर्ष 2016 में यह आंकड़ा 221 था। दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाके में ही मरने वाले बेघरों की संख्या में 200 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि इन मौतों के बारे में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी की अलका लांबा ने दावा किया था कि ये मौतें सर्दी की वजह से नहीं, बल्कि नशे के कारण हुई पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने स्वीकार किया था कि बेघरों की मौत के लिए नशे के साथ-साथ भुखमरी भी बड़ा कारण है और इसकी जिम्मेदारी आम आदमी पार्टी नहीं, बल्कि राजनिवास और केंद्र सरकार सपनों पर संवेदनहीनता पर है।अगर दिल्ली को ही देखें तो यहां डेढ़ लाख बेघरों की जरूरत के उलट रैन बसेरों में महज 4890 लोगों के रहने की व्यवस्था है। सभी बेघरों की जरूरत के मुताबिक कम से कम सवा 19 लाख वर्ग फीट जगह की जरूरत है, लेकिन फिलहाल मौजूदा रैन बसेरों में सिर्फ दो लाख वर्ग फीट जगह मुहैया कराई गई है। यही नहीं, पिछले दिनों ऐसे समाचार भी आए थे कि दिल्ली स्थित एम्स के नजदीक स्थित जिस सबवे को रात में रैन बसेरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है, उसे कमाई के उद्देश्य से किसी व्यावसायिक संस्था को दे दिया, जिससे अस्पताल में इलाज कराने आए लोगों के परिजनों को खुले में सड़क पर रात बितानी पड़ती है ।बहरहाल, बेघरों के रहने के ठिकाने यूं ही खत्म नहीं होते। जब सरकारें उन्हें व्यर्थ मानकर पैसा देना बंद कर देती हैं या फिर उस जगह को किसी व्यावसायिक उपयोग में ले लिया जाता है तो रैन बसेरे उजड़ जाते हैं। इंडो-ग्लोबल सोशल सर्विसेज सोसाइटी यह खुलासा कर चुकी है कि दिल्ली सरकार जो रैन बसेरे तंबुओं में लगाती है, उनमें से ज्यादातर इसलिए बंद हो जाते हैं क्योंकि उन्हें मिलने वाला पैसा रुक जाता है। कायदे से ये रैन बसेरे पक्के भवन में चलने चाहिए पर तंबू या शामियाने में बने होने के कारण लोग कई सुविधाओं से वंचित हो जाते हैं।
बेघरों के सपनों पर संवेदनहीनता की कीलें